इस सन में दिनाँक 19-09-2013 से श्राद्ध मास का आरम्भ हुआ है। ये 04-10-2013 तक चलेंगे। ये पितर के दिन भी कहलाते हैं। पितर वो हैं जो हमारे पूर्वज स्वर्ग सिधार गये हैं। हमें पितर तर्पण का विशेष ध्यान रखना चहिये। श्राद्ध प्रकरण में बतलाया गया है की पितरों का श्राद्ध अवश्य करना चाहिए, किसी भी प्रकार क्रिया का लोप न करें। श्राद्ध पूरे मन से भक्ति भाव के साथ करना चहिये। यदि कोई इंसान श्राद्ध के सभी साधन जुटाने में असमर्थ भी हो, तो भी वह अपने भक्ति भाव से अपने पितरों को तृप्त कर सकता है। पितर सब जानते हैं और सभी परिस्थितियों को समझते भी हैं क्योंकि वे बहुत दयालु होते हैं।
मातामहस्य तत्पल्या: श्राधं पित्रवदाचारेत । "
महर्षि
कपिल ने देवपूजन इत्यादि से भी पितृ कर्म, तर्पण, श्रधा आदि को अधिक महत्व
देते हुए की जैसे सभी ग्रहों में ग्राहादिपति सूर्य अधिक श्रेष्ठ हैं,
वैसे सभी कर्मों में पैतृक कर्म उत्तमोत्तम कर्म है-
"कर्मभ्यो निखिलेभ्यो वै सुर्यग्रहाधिक:॥
पैतृकं कर्म परममधिकं चोत्तामोत्त्म्म।"
यहाँ
तक कहा गया है कि कलयुग में श्राद्ध एवं संध्या-कर्म से ही विप्रत्व
प्रतिष्ठित रहता है और ये ही दो कर्म उसकी निवृति में परम हेतु हैं, इसलिए
उसे चाहिए की श्रधा-भक्तिपूर्वक इन दोनों सत्कर्मों को अवश्य करें।
कन्या
एवं पुत्र के विवाह में, गृहप्रवेश में, चूड़ाकर्म में, सीमान्तोन्नयन,
पुत्रजन्म आदि शुभ कार्यों में, नान्दीमुख-श्राद्ध और पितरों का पूजन करना
चाहिए।
श्राद्ध-प्रकरण के प्रसंग में ही
'दौहित्र' की महिमा और 'दत्तक' पुत्र-ग्रहण की विधि तथा उसकी
श्रधाधिकार-मीमांसा का बड़े ही विस्तार से सूक्ष्म रीति से वर्णन किया गया
है।
प्रेतत्व की निवृति के लिए सपिन्डिकरण श्राद्ध की आवश्यकता बतलाते हुए कहा गया है की बिना सपिन्डीकरण-श्राद्ध किये प्रेतत्व की मुक्ति नहीं होती।
"सपिन्डिकरणभावे प्रेतत्वं न निवर्तते।"
मृत व्यक्ति की दस दिन तक 'प्रेत' संज्ञा होती है, उसके निमित्त दशगात्र-श्राद्ध किया जाता है। तदनंतर सपिन्डिकरण-श्राद्ध होता है, जिसमें प्रेत के पिण्ड को पितरों के पिण्डों में मिलाया जाता है, इसीलिए वह सपिन्डीकरण-श्राद्ध कहलाता है। उस दिन से पितरों में गणना हो जाती है। समान पिण्ड्वालों को दस दिन तक का जननाशौच और मरणाशौच लगता है।
"दशरात्रं सपिंडानामं जातकं मृतकं स्मृतं।"
सपिण्डीकरण-श्राद्ध
के अनन्तर उदकुम्भ-दान होता है। इसके बाद मासिक श्राधों को
पार्वण-श्राद्ध के विधान से करना चाहिए। अंत में सांवत्सरिक या वार्षिक
श्राद्ध करना चाहिए। पुत्रहीन चाचा, बड़े भाई, मातामह तथा उनकी पत्नी का
श्राद्ध पिता के समान ही करना चाहिए।
"अपुत्रस्य पितृवयस्य भ्रातश्रैच्वाग्रजन्मन: ॥ पैतृकं कर्म परममधिकं चोत्तामोत्त्म्म।"
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